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शनिवार, 31 जनवरी 2015

''दुआ''

मै जो करता
तेरी ख़ुशी के लिए दुआ
तो ये भी बुरा होता,
हम न जाते तुझसे कुछ कहने
सुनता अगर मेरी खुदा होता।

अमल में तेरे खाक छानी है
हर एक नशेमन की,
कितनी ही मीनाओं से मै,
होके रुसवा लौटा..
न जाता तेरे कुचे
गर जरा भी
मय से मुझको नशा होता।

मिल के मुझसे,
गर जो तुम मुस्कुराते
तो आप ही बताओ
आपका क्या बुरा होता
आप भी खुश रहते,
अपना भी भला होता।

तू सामने हो और
लब से कुछ कह सकू
दिल में वो ताब कहाँ
जो मै तुझसे न कह सका
काश तूने कभी वो भी
सुना होता।

                               -जान
 पुरानी डायरी के झरोखे से

''ब्लैकहोल''


ओ ! मेरी  कहकशां, 

तुमको ढुंढू मै कहाँ-कहाँ  

कितना भी मै डूब जाऊ 

तुझको छू न पाऊ !

प्रकाश की गति 

से भी तेज़,मन तुम्हारा 

छोड़ जाता है मुझको बेसहारा,

 और फिर जब खुलता है,

आकाशगंगा का ये पिटारा;

तो बस मै गिरता जाता हूँ 

केवल  गिरता जाता हूँ

उसी काली ब्लैकहोल में,

जहाँ से कभी कोई

वापस नहीं लौटा,

यहाँ तक कि समय भी नहीं। 

                        -कृष्णा मिश्रा 

                          ३१ जनवरी १५ 

'झमेला'

ये दुनिया एक झमेला
इस झमेले में मै अकेला।

बड़ी प्रगति पर है दुनिया
गुरु गुरु न रहा,न चेला-चेला।

बेआबरू होकर ईमान,जिस्म छोड़ गया
हसीनो ने खूब खेल खेला।

मिट्टी-मिट्टी में मिल जाएगी,
जिस्म है ये मिट्टी का ढ़ेला।

आओ दोस्त बन जाये हम दोनों,
तुम भी अकेले मै भी अकेला।

मै अपने रस्ते पे मस्त चल दिया
जाने कहाँ गया, मुसाफिरों का रेला।

ये इश्क है आग का दरिया ए-जिगर
हम कहाँ जाने वाले थे,जाने किसने धकेला।

मै ये समझा के तू आ गयी
पास कहीं महक रही थी वेला।

वो हरा-भरा पेड़ सूखने लगा है
फिजा में ये जहर किसने है उड़ेला।

हर-बार लगता है कुछ अलग कुछ नया सा
वो चितेरा है बड़ा अलबेला।

न रखिये शिकायत और न शिकवा किसी से
अकेले आये थे हम जान जाना है अकेला।
                     
                            --जान

            पुरानी डायरी के झरोखे से

''सपना सजाया है''

एक सपना सजाया है
तुमको न खोया है न पाया है

तुम प्यार की रस्म
अदा करो या न करो,
हमने तो जन्मो-जन्म
यही रस्म निभाया है


इक मंदिर है,
कोई शीशमहल नहीं,
मूरत को तेरी
जहाँ बिठाया है

तुम इम्तिहान
मेरी वफ़ा का क्या लोगे
बुझेगा न ये दिया
जिसको खुदा ने जलाया है
               
               -जान
 पुरानी डायरी के झरोखे से

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

'तेरी आँखें'


                                                         अब जिएंगे हम किसके सहारे
                                                   तेरी आँखों में अब वो इताब कहाँ 
उठ जाये तो क़यामत ,झुक जाये तो क़यामत 
तेरी पलकों  का जवाब कहाँ । 

अजल से अबद तक है कायम 
और कहीं ऐसा शबाब कहाँ 
हर रोज जुड़ती है ,नए क़त्ल की दास्तां 
तेरी आँखों सी अजब किताब कहाँ । 

तेरे सितम-ओ-करम को रखते है,
सर-आँखों पे मुस्कुराकर 
माना तुमसा कोई नहीं, 
पर हमसा भी दिल का नवाब कहाँ । 

वाह रे!उनके रंग में
खुद को रँगने की जुस्तजू
और कुछ नहीं ना सही,
मुझसे किसी के ख़्वाब कहाँ।

                                   -'जान'
''पुरानी डॉयरी के झरोखे से'  मई०५ 

सोमवार, 26 जनवरी 2015

''अदना सा फ़साना''

अपनी जिंदगी का अदना सा फ़साना है,
इश्क़ में जीना है ,इश्क़ में मर जाना है। 

जीता है कौन जिंदगी को जिंदगी की तरह,
वो कोई और नही इक दीवाना है। 

आँखों और नजरों की जादूगरियों को क्या कहिये 
चुभ जाये तो तीर,चढ़ जाये तो मैख़ाना है। 

 मोहब्बत है क्या,किसने ये जाना है
समझो तो सबकुछ है, न समझो तो अफ़साना है। 

भरम तेरी निगाहों का औ राज-ए- तबस्सुम 
धोख़े देना है और धोखे खाना है। 
  
जिनके लिए हम खुद को मिटा बैठे ,
उनके लिए ये इक  पागलपन, अपने लिए ख़ुदा को पाना है । 
                                            
                                               - 'जान '
                                               ''पुरानी डॉयरी के झरोखे से'' २२ जनवरी ०५ 
                                                             






'आज सुबह देखा तो'


आज सुबह देखा तो वो गेसू सुखा रहे थे
जैसे काले बादल बिजलियाँ गिरा रहे थे । 

हाय वो गाल पे ढलकी-ढलकी बूंदें,
 हम भी उनकी किस्मत से रश्क खा रहे थे । 

ये बेखुदी क़ैसी है छा रही... ?
उफ़ ये शबनमी झोंके; गेसुओं को जो उड़ा रहे थे। 

 ये बादलों की ओंट से,निकलता आफ़ताब
किस कदर साहिलों पे सितम ढा रहे थे। 

ये जो रंग आया है, सुर्ख-सिंदूरी तेरे बदन का.. 
किसके खूँ से आज तुम नहा रहे थे ।

                                                                    -'जान'

शनिवार, 24 जनवरी 2015

'दर्द'

सुबह से दर्द दरवाज़े पे खड़ा है.. 
 भिखारी की तरह ;
आँसुओ के मोती मांग रहा है,
 जब देखो मुँह उठाए चला आता है !
दिल में हाथ डाला तो छुट्टा नहीं था। 

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

मुझे मुक्त कर दो!


                                                                    मुझे मुक्त कर दो!
मेरे अपनों से,
दुनियाभर के सपनों से,
 माँ की मुरादों से ,
बीवी की फ़रमाईश से,
रिश्तेदारों की  आजमाईश से । 


मुझे मुक्त कर दो! 
 बैंक के पासबुक से , 
बिजली के बिल से,
गैस के रिफिल से,
दुनियाभर के उधारो से,
राशन की कतारों  से। 


मुझे मुक्त कर दो!
 ख्वाबों से ,
खयालों  से, 
 किताबों  से ,
सवालो से,
बवालों से। 


मुझे मुक्त कर दो! 
डायरी से ,
शायरी से ,
गीत से ,
ग़ज़ल से,
 कविता से। 


मुझे मुक्त कर दो!
गद्द से,
पद्द से ,
छंद से,
चौपाई से ,
रुबाई से । 


मुझे मुक्त कर दो! 
प्यार से ,
व्यापार  से ,
व्यवहार से ,
सदाचार से ,
 अनाचार से । 


मुझे मुक्त कर दो!
वफ़ा से ,
बेवफाई से ,
वस्ल से ,
तन्हाई से ,
रहनुमाई से । 



मुझे मुक्त कर दो!
हिन्दू से ,
मुस्लिम से ,
सिख से,
ईसाई से , 
खुदाई से !



 और अंत में.…
मुझे मुक्त कर दो!
 गूगल से ,
 व्हाट्सएप्प से,
 फेसबुक से ,
ट्वीटर ,  
 ब्लॉगर से । 








  






बुधवार, 21 जनवरी 2015

''ऑटोग्राफ''

ऑटोग्राफ 




आज सुबह जैसे ही मैंने, 
दरवाजा खोला : ऑटोग्राफ के लिए
 एक बच्चा हाथ उठाये खड़ा था -
 मन ही मन गदगद होकर,
 मैंने तुरंत जेब से पेन निकाली और 
अपना फर्राटेदार हस्ताक्षर दे मारा !

तभी उसने झट से अपना मैला सा 
 हाथ खींचा और बोला : मुदे  ऎ नही ताहिये । 
मैंने कहा : फिर क्या चाहिए ?
वह बोला ; पैछै (पैसे ) !!
 यह सुनते ही मै धरातल पर आ गया !!
और कुछ देर तक उसका चेहरा ही देखता रहा 
फिर भारी मन से मैं बोला; 
बेटा! 'पैसे तो नही हैं,पर तुम यह पेन रख लो !ये बहुत कीमती है ।
मेरे हाथ से पेन लेकर,उसने उस ३ रूपये की कलम को  
चारों तरफ से घुमा-घुमाकर देखा,
 फिर कुछ देर तक मुझे घूरता रहा,इस बीच मै
अपने गंतव्य की ओर जाने को बढ़ा ही था कि. पीछे से आवाज़ आई;
लुकिए !!
जैसे ही मै पीछे मुड़ा : उसने  १० की नोट मेरी और बढ़ा दिया । 
यह मेरे स्वाभिमान को सीधे तौर पे चुनौती थी,
इतने में वह मुस्कुराता हुआ,मेरी दी हुई पेन को मेरी ओर बढ़ाते हुये, 
फ़िल्मी अंदाज मे  बोला; आतोग्लाफ पिलीद!! । 
                                                                                                         
  

                                                                             ---कृष्णा मिश्रा 



मंगलवार, 20 जनवरी 2015

''अब गाऊ मै कौन सा राग''

अब गाऊ मै कौन सा राग
विरह ने भी तेरी दिया मुझको त्याग 
''अब गाऊ मै कौन सा राग''

आनंद  है कोई ?कैसी ये अनिभूत 
 जिससे हुआ हूँ  मैं अभिभूत
तुम ही  हो, तुम्ही हो
  जाने किस भेस में आये हो;
जागा  प्राण में ये कैसा  उन्माद...
 अब गाऊ मै कौन सा राग। 


उदीप्त ,हुआ हृदय में कैसा ये दीप 
आलोक है फैला,हर दिशा में प्रदीप । 
बजा ये कैसा सुर अंतर में? 
 बांध न पाऊ जिसको मैं स्वर में। 
यथा,व्यथा, सब गयी भाग.… 
अब गाऊ मै कौन सा राग। 


फिरू लय  में इस पागल सा 
खोया, खुद में विह्वल सा;
पिरोऊ, मन मे मन के मोती 
जोडूं  ज्योत में तुम्हारे ,अपनी ज्योति 
लागी ये कैसी लाग.... 
अब गाऊ मै कौन सा राग । 
                           -कृष्णा मिश्रा 


रविवार, 18 जनवरी 2015

''परिस्थिति बनाम कर्तव्यनिष्ठा''

                                 आधुनिक विज्ञान और तकनीकी ने जहां एक तरफ़ हमारे कामकाज को आसान बना दिया है ,वहीं  दूसरी ओर हमें और भी अधिक व्यस्त  किया है । और बहुत मामलों में युँ कहे की अस्त -व्यस्त किया  है तो कोई अतिशयोक्ति  नही होगी।  इस कारण हम लगभग हर काम जल्दीबाज़ी में करने के आदी  हो गए है । हर व्यक्ति यही चाहता है कि सबकुछ,सबसे अच्छा ,और सबसे कम समय  में हो जाये । खैर ऐसा सभी क्षेत्र में संभव तो नही है,पर फिर भी हम बहुत से कार्यो  को आवश्यकता के अनुसार समयसीमा में बांध  सकते है। जिसको हम सभी को समझने की परम आवश्यकता है,प्रथमतः हमें इस विषय में गूढ़ विचार करना ही होगा।
                                   किसी कार्य को शुरु करने ,संपादन, पूर्ण होने में ढृढ़ संकल्प और परिस्थितियों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है ,संकल्प लेना न लेना  अथवा किस हद तक लेना ,ये अपने हाथ में है। पर परिस्थिति के सन्दर्भ में कुछ कहा नहीं जा सकता । परिस्थितिवश कोई कार्य शुरू होकर तुरंत पूर्ण भी हो सकता है और कोई  हजार कोशिशों  के बावजूद शुरू भी न हो पाये ऐसी भी स्थिति बन सकती है। अब परिस्थिति को कैसे नियंत्रित किया जाये, यह बड़ा ही महत्वपूर्ण और भ्रमित करने वाला प्रश्न है।पहले तो हम परिस्थिति को ही समझने का प्रयास करते है,परिस्थिति अर्थात हमारे चारो तरफ की स्थिति,जिसमे सबकुछ समाविष्ट है जैसे -  आपका स्वास्थ,पारिवारिक समस्यायें, योजनायें, आर्थिक स्थिति, आपके सगे-सम्बन्धियों मित्र आदि का प्रभाव और इन सभी प्रभाव  के अनुरूप आपका मनोभाव ! अब प्रश्न यह उठता है कि-- क्या व्यक्ति परिस्थिति के अधीन है? या फिर परिस्थिति को नियंत्रित भी किया जा सकता है?      

                                   "सबहीें नचावत राम गोसाई "

                                         आपने श्रीरामचरितमानस की यह पंक्ति तो सुनी ही होगी,जिसका सीधा-सरल अर्थ यह है कि हम सब विधाता की हाथ की कठपुतली है,जो  भगवान की इच्छा होगी वही होगा ।हमारे हाथ में फिर क्या बचा ?आइये हम उसी रामचरितम् के भगवान राम  के जीवनचरित्र को देखे,जहाँ से यह पंक्ति उदित हुयी है---
                                          क्या राम का सारा जीवन परिस्थितियों के अधीन नही रहा ?जन्म शिक्षा-दीक्षा ,विवाह ,वनगमन ,और राम-रावण युद्धः। परिस्थितिवश भगवान ने अवतार लिया ,परिस्थितिवश गुरु  विश्वामित्र के साथ जाना पड़ा ,परिस्थितिवश विवाह हुआ ,वनगमन माता कैकेयी के मनोभाव से उत्पन्न परिस्थिति का  परिणाम थी, सीताहरण की परिस्थिति के कारण राम-रावण युद्ध हुआ, क्या यह सभी पूर्वनियोजित भगवान की लीला थी ? इस प्रश्न का उत्तर जो भी हो पर हम यह स्पष्टरूप में  देखते हैं कि स्वयं भगवान भी परिस्थिति के अधीन रहें। पर मूलबात  यह नही है, मूलबात यह है कि परिस्थिति के स्वीकार्य  के साथ-साथ अपनी कर्तव्यनिष्ठा और प्रत्येक दशा में अपने विचारों की दृढ़ता ।श्रीराम प्रभु की प्रभुता इसी दृढ़ता में निहित  है कि चाहे जैसी भी परिस्थिति आई उन्होंने उसे सहर्ष स्वीकार  किया तथा अपनी कर्तव्यनिष्ठा  और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा ।
                                         आज के युग में उपरोक्त विचारों की कितनी प्रासंगिकता है ? यह हम महान विभूतियों की जीवनियाँ उठकर देख सकते हैं--चाहे वो आधुनिक युग  के हों या किसी भी कालखण्ड  के।  
                                     
                                                                                                                                     -कृष्णा मिश्रा


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मंगलवार, 13 जनवरी 2015

''मोहब्बत की दुनिया''


मोहब्बत की दुनिया यूँ आबाद करना
जब जब भी दिल धड़के हमें याद करना..!



तुम्हारी जुल्फ. तुम्हारे लब. तुम्हारी निगाहें
मस्त जादू भरी तुम्हारी अदायें
इस कैद से ना ...
                                       इस कैद से ना............हमें आज़ाद करना..!
                                    जब जब भी दिल धड़के हमें याद करना..!!




देख के हुस्न तुम्हरा..फूलों को आये पसीने
अब ये दूरियाँ..हमको न देगी जीने...
मिलने का वख्त तुम....
                            मिलने का वख्त तुम.....जल्द इज़ाद करना..!
                        जब जब भी दिल धड़के हमें याद करना..!!



हम तो हो चुके है तुम्हारें
                         दिल नही लगता कही तुम्हारे बिना रे 
मंजूर हमको...
                                          मंजूर हमको....आबाद करना या बरबाद करना..!!
                                जब जब भी दिल धड़के हमें याद करना..!!

                                                                           -'जान' गोरखपुरी

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