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शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

ख़त्म कर ये बवाल दे...

ए मेरे ख़ुदा कोई जलवा तो , दिखा ख़त्म कर ये बवाल दे
है ये जिस्म क्या है ये रूह क्या, न जुदा रहे न विसाल दे                      (विसाल= मिलन)
 
कहे मौलवी कहे पादरी, है ये पंडितों ने भी तो कहा
तू मिले उसे जो ले मान बस, न उठा कोई जो सवाल दे

हाँ चलो मेरा ये नसीब है, करूँ काफिरी तो यही सही
तेरा फैसला मुबारक तुझे, न सवाल हो न मजाल दे                        (मजाल= शक्ति,सामर्थ)

तेरी मिल्कियत तो खुदा नही, है मेरा भी तो वही नाख़ुदा                 (नाख़ुदा= खेवइया, पार करने वाला)
मैंने खुद को सौप दिया उसे, गो जलाल दे या जवाल दे                  
 (जलाल=तेज प्रकाश,ईश्वर अपना दीदार कराए)
                                                                                                               (जवाल= अवनति)


हाँ ये इश्क तो है ख़ुदा मेरे, तेरी बन्दगी का ही नाम ही
"मेरा इश्क भी कोई इश्क है, कि न खुश करे न मलाल दे"



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                 (c) जान गोरखपुरी
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         (तहरी मुशायरे में प्रेषित गज़ल)
                 २४ अप्रैल २०१५





रविवार, 19 अप्रैल 2015

ये हसीन काम..




हाँ ये हसीन  काम हमने ही किया
खुद को तो तमाम हमने ही किया


आगाजे-बरबादी तेरा थी करम
अंजाम इंसराम  हमने  ही किया                            (इंसराम = व्यवस्था)

रोज ये कहना कि न आयेंगे पर
कू पे तेरी शाम हमने ही किया                                 (कू= गली/दर)

हुस्न पे यूँ सनम न हो तू बदगुमां
जहाँ में तेरा नाम हमने ही किया

हर सुबह न मुँह को लगायेंगे कभी
और शाम-इंतजाम हमने ही किया                  

कौन गुजरता वरना ’जान’ यां से
इन मिसाल को गाम हमने ही किया

किसकी थी मजाल तंज जो करता
खुद को ‘जान’ निलाम हमने ही किया



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              (c) जान गोरखपुरी
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                  १९ अप्रैल २०१५

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

'मस्तों के कलन्दर भोले पिया'

तेरी महफ़िल के दिवाने को सनम और कोई महफ़िल भाती नही
तू जिसे जलवा दिखा दे,उसको अपनी याद भी फिर आती नही

***
तेरी मस्ती में मै हूँ सरमस्त,मस्तों के कलन्दर भोले पिया
तेरी मूरत यूँ छपी दिल में के,सूरत कोई दिल छू पाती नही

***
यूँ जिया में है भरी झंकार के,धड़कन मेरी पायल बन गयीं
मन थिरकता वरना क्यूँ ऐसे,मिलन के गीत सांसें गाती नही

****
आफताबो-माहताबो-कहकशां रौशन हैं तेरे ही नूर से
इश्क़ बिन तेरे,न टरता कण भी,दुनिया क्षण को भी चल पाती नही

***
वारि-वारी जाऊ तेरे रंगरेजा, ओ-मुसव्विर-ए-कायनात
कोई शय ऐसी नही जिसमें, तेरी जादूगरी भरमाती नही



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                         (c) ‘जान’ गोरखपुरी
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                      16 अप्रैल २०१५

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

क्षणिकाएं: व्यवहार

१) प्राणिमात्र के प्रति
  आपका व्यवहार ही अस्ल में
  सबसे बड़ी पूजा है,
  और भवसागर पार करने का..
  सबसे आसान और उत्तम साधन!

२) गर सुदामा सा हो व्यवहार
  तो स्वयं भगवान भी
  नंगे पाँव दौड़े आते है,गले से लगाने!

३) व्यवहार वह कुंजी है,
   जिससे मनुष्य के हृदय का
   ताला खुलता है!

४) व्यवहार ही वह माध्यम है
   जिससे ज्ञान के द्वार खुलते है,
   क्युकी गुरु शिष्य की बुद्धि देखकर नही..
   वरन! व्यवहार देखकर ही अपनी कृपा बरसाता है!
 
५) व्यवहार सबसे बड़ा धर्म है,
   इसमें समाहित है...सच्ची-
   युक्ति,शक्ति,भक्ति,तृप्ति,मुक्ति!





    -कृष्णा मिश्रा
    ११ अप्रैल २०१५

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

मीना-ए-तलातुम.....



जिंदगी ये, जिंदगी से महरूम
मै कहाँ....और......कहाँ तुम


क्यूँ है, कोई यूँ बला का मासूम
फिर क्यूँ ना हो होशो-दिल गुम

कयामत है कि जिन्दगी?तेरे होठों पे तबस्सुम
कोई जी गया,कोई मर गया,क्या तुम्हे भी है मालूम?

कई घर उजड़े,कई बस्तियां वीराँ हुयीं
वो मस्त आँखें है जान’ मीना-ए-तलातुम              (मीना-ए-तलातुम = तूफानी मयकदा)

कुछ तो बात हुयी है जान  जरुर
कई दिनों से है वो बहुत गुमसुम




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         (c) जान गोरखपुरी
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      पुरानी डायरी के झरोखे से

           मार्च २००६

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

तू ही बता....



तू ही बता ए-ख़ुदा 
खुद से
        ख़ुदी को!
यानी...
        मुझको
        मुझसे
        मुझी को।


ढूँढूँगा बाद में
          दुनिया में
          दुनिया को
पहले...      
          खुद में
          खुद से
          ख़ुदी को।


समझा ए-मोहब्बत
        मोहब्बत को

है माँगा मैंने
           उसको
           उससे

           उसीको।








पुरानी डायरी के झरोखे से...
२००६ में!

सफ़र-ए-वफ़ा में..



सफ़र-ए-वफ़ा में हुयी,तो वही बात हुयी
हुयी तो उसी बेवफा से मुलाकात हुयी

मै हूँ इश्क में या,कि दिल है कफ़स में तेरी
कि है मुझको मालिक मिरे कैद-ए-जुल्मात हुयी                                                                           
कोईतो नही जुल्फ-ए-स्याह में जो सुलाय
है फिर आज बुझती हुयी सी दगा रात हुयी

न थी जिसको इल्मे-वफा-ओ-करम  यारब
उसी संग़दिल से थी क्यू ‘’जान वफ़ आत हुयी

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        (C) 'जान' गोरखपुरी
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मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

खुदा तेरी ज़मीं का..





खुदा तेरी ज़मीं का जर्रा जर्रा बोलता है
करम तेरा जो हो तो बूटा बूटा बोलता है

किसी दिन मिलके तुझमें, बन मै जाऊँगा मसीहा
अना की जंग लड़ता मस्त कतरा बोलता है

बिछड़ना है सभी को इक न इक दिन, याद रख तू
नशेमन से बिछड़ता जर्द पत्ता बोलता है




हुनर का हो तू गर पक्का तो जीवन ज्यूँ शहद हो
निखर जा तप के मधुमक्खी का छत्ता बोलता है

बहुत दिल साफ़ होना भी नही होता है अच्छा
किसी का मै न हो पाया,ये शीशा बोलता है

गले से भी लगाया बज्म-ए-मय में भी बिठाया
किसी ने सच कहा है दोस्त,कपड़ा बोलता है


सुनो दीमक अहं की चट है जाती आदमी को
युं गर हो शख्स कम, ज्यादा तो ओह्दा बोलता है

हुई बारिश घरौंदे साथ बुनकर तोड़ बैठे
वही दिन थे सुनहरे दिल का बच्चा बोलता है

बड़े खुदगर्ज पत्थर लोग़ रहते हैं जमीं पर
फ़लक से टूटता बेकल सितारा बोलता है


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                 (c) 'जान' गोरखपुरी
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                 ०७ अप्रैल २०१५

रविवार, 5 अप्रैल 2015

''मंतर''

मुझे बिच्छू के
मंतर नही आते थे..
हाँ चीटियों के भी नही..
मुझे कभी शौक भी नही रहा उस खजाने का!
पर नागिनें अकसर
मुझपे मेहरबान रही!
मौका मिलते ही डस लेती थीं,
क्यूंकि उन्हें जाँचनी होती थी
उनके अपने दंश का असर!
और मेरी जीवटता उनके लिए
प्रयोग की बिल्कुल सही जन्तु थी!




पूरी ताकत से विष
उगलती देती थी वें
मेरे भीतर! सुनने को मेरी उफ़!
और मै उनींदा बरसों नींद की
तलाश में तडपता रहता,
पर होश मेरे कदम
छोड़ने को तैयार न होते कभी!
गश खाकर मै कई बार बैठा!
पूरे भरे दिल के साथ
धडकनों को पूरी रफ़्तार से सुनते हुए!
फिर अचानक से
थमते!जैसे ...के बस ख़त्म!
लेकिन फिर होश बाजी मार ले जाता घिनौनी सी हँसी हसते हुए!!




अर्सा बीता और अब मुझे भी रहा नही जाता था
नागिन और उसके विष के बिना,
तड़पने में मजा आने लगा.....,
अब मै आजमाइश पे था,
अफीम से लेकर धतूरा तक घुलने लगा खून में मेरे
पर तेरे जहर को टक्कर न दे पाया कोई!
कोशिश यही रहती थी..
उनींदापन और होश की लड़ाई चलती रहे!
धडकनों को रफ़्तार!और धक्क से रुकने!फिर चलने में
मुझे जिन्दा होने के सबूत मिलते थे,
और सच मायने में तो
मुझे अब चाहिए था.......
लम्हों में सदियों के गुजरने सा एहसास!
के बस जिंदगी गुजर जाये जैसे-तैसे!




और करम ऐसा के नागीनें जिंदगी के
हर मोड़ पर मिलती रही...
जींस्त दिलचस्प बनी रही!
घड़ी-घड़ी शह और मात की
बाजियां चलती रही..
जाने अनजाने मै भी अपनी चालें
चलता रहा,क्यूंकि मुझे..
जीत और हार से अबके कोई मतलब नही था....
तो समझ को बस ‘’बैकग्राउंड’’ में
चलने को छोड़ दिया..
करती रहो तुम अपनी
जोड़-घटाव, गुना-भाग
हाँ अगर कोई निष्कर्ष आ जाये तो बता देना!
अभी तक तो उसने मुझे कोई खबर नही दी है!
और शायद दे भी न पाये!




अब एक बात तो तय थी के
मुझे किसी मंतर-जंतर सीखने जरुरत नही थी,
विष इतना हो चला था के,
अब नंगे पाँव अंधियारी रात में
जंगल-जंगल बाँबीयों के बीच सुकून
पाने को टहलने लगा था..
मेरे कान भी अब धमक
और खनक सुन लेते थे जरा सी हलचल पे भी!
ये नया अहसास तो मेरे अन्दर की चीत्कार को
और गुंजाने लगता!
शब्द हुंकार बन गए,सुर थिरकते लगे अविराम
बीन और शहनाई की धुनें एक साथ बजतीं
पर मैं चुप ही रहता!
पर अन्दर अन्दर
अणु-परमाणु के क्रमिक विखंडन
को संभाले हुए..............*****
                                   
                                            *****क्रमशः



                                       -'कृष्णा मिश्रा'
                                   ०४-०५ अप्रैल २०१५









गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

मै तो बलिहारी...




मै तो बलिहारी,अमीर हो गया
इश्क़ में रब्बा फकीर हो गया

***

मेरे रांझे का मुझे पता नही
बिन देखे ही मै तो हीर हो गया

**

उसके जलवे यूँ सुने कमाल के
दिलको किस्सा उसका तीर हो गया

***
शिवशिवा घट-घट मुझे पिलाओ अब
तिश्न मै वो गंग नीर हो गया

**

उसको पहनूं धो सुखाऊँ रोज मै
लाज मेरी अब वो चीर हो गया

***

गाऊँ कलमा मै सुनाऊँ दर-ब-दर
‘’जान’’ज्यूँ मै कोई पीर हो गया



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          (c) ‘जान’ गोरखपुरी
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           ०२ अप्रैल २०१५

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