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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

मीना-ए-तलातुम.....



जिंदगी ये, जिंदगी से महरूम
मै कहाँ....और......कहाँ तुम


क्यूँ है, कोई यूँ बला का मासूम
फिर क्यूँ ना हो होशो-दिल गुम

कयामत है कि जिन्दगी?तेरे होठों पे तबस्सुम
कोई जी गया,कोई मर गया,क्या तुम्हे भी है मालूम?

कई घर उजड़े,कई बस्तियां वीराँ हुयीं
वो मस्त आँखें है जान’ मीना-ए-तलातुम              (मीना-ए-तलातुम = तूफानी मयकदा)

कुछ तो बात हुयी है जान  जरुर
कई दिनों से है वो बहुत गुमसुम




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         (c) जान गोरखपुरी
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      पुरानी डायरी के झरोखे से

           मार्च २००६

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