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मंगलवार, 31 मार्च 2015

जो न सोचा था कभी...



जो न सोचा था कभी,वो भी किया किये
हम सनम तेरे लिये,मर-मर जिया किये


***


तेरी आँखों से पी के आई जवानियाँ
दम निकलता ही  रहा, पर हम पिया किये


***

आँख हरपल राह तकती ही रही सनम..
फर्श पलकों को किये,दिल को दिया किये


***

आदतन हम कुछ किसी से मांग ना सके
और हिस्से जो लगा वो भी दिया किये


***

जख्म को अपने कभी मर हम न मिल सका
गैर के जख्मों को हम तो बस सिया किये







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          (c) ‘जान’ गोरखपुरी
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    ''पुरानी डायरी के झरोखे से''
              १७ मार्च २००६

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

'गुलाब आँखें'

मेरी दुनिया रहने दो अपनी ख़्वाब आँखें
दो जहाँ हैं मेरी ये दो गुलाब आँखें                           (गुलाब आँखें= महकती आँखें)





अब तू सम्हल जिंदगी होश खो चुके हम
है मिला दी आंखों उसने शराब आँखें





ढूंढ लेंगे हम.....रहो पास तुम बैठे
सब सवालों का देती हैं जव़ाब आँखें





मेरी मोहब्बत इबादत है हर नफ़स में
रखती हो तुम तो मेरा सब हिसाब आँखें





तुम पलक के मस्त पन्ने उलटते जाओ
पढ़ रहा हूँ 'जान' तेरी किताब आँखें





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        (c) ‘जान’ गोरखपुरी
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              २७ मार्च २०१५ 

बुधवार, 25 मार्च 2015

गुनाह अपने भी कई मकबूल हैं...

खुशियों में होते है सब हमसफ़र..
गम में साथ कोई खड़ा नही होता!
दूसरों को करके छोटा ए-दोस्त...
कोई बड़ा नही होता!


जाने कितनी खायी ठोकरे
लाख रंजिश की गम ने..!
सामने खींचकर बड़ी लकीर
बड़ा बनना सीखा नही हमने..!!
यही करना था तो तलवार उठाई होती!
हाथ में कलम की न रोशनाई होती..
जंग अदब की मै लड़ा नही होता!!
दूसरों को करके छोटा ए-दोस्त...
कोई बड़ा नही होता!




जिसने रची है सारी ही सृष्टि
उसने है दी सबको एक आसमाँ एक ही जमीं..
जब खुदा ने खुद फर्क न किया बन्दों में!
तो बाँध मत वाइज उसे मतलब के धन्धों में!!
लाख बड़ा बन जाये कोई मगर
उससे कोई बड़ा नही होता!!



आये है सब वहीँ से,जाना है सबको वहीँ
बात है सच,मानो या मानो नही!
मै,मै हूँ करता तुम,तुम हो करते!
एक वो है कि....
शताब्दियों शताब्दियों
युगों युगों से,सुनता है सबकी
मगर कभी कुछ बोलता नहीं होता !



हम कोई रसूल हैं?
गुनाह अपने भी कई मकबूल हैं
कुबूल है!कुबूल है!कुबूल है!
वर्ना बनके गर्द-ए-गुबारां दर-ए-यारां पड़ा न होता!
दुनिया में जान अपना घड़ा न होता!!

दूसरों को करके छोटा ए-दोस्त...
कोई बड़ा नही होता!



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 (c) कृष्णा मिश्रा जान गोरखपुरी

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      १४ सितम्बर २००६

मंगलवार, 24 मार्च 2015

जिसे हर शय में...

जिसे हर शय में देखा था
नजर का मेरी धोखा था।


भरम तेरी निगाहों का
कोई जादू अनोखा था।


सदी बीती जहां लम्हों
मेरा जग वो झरोखा था।


बरसतीं खार आखें अब
लबों सागर जो सोखा था।


गया न इश्क खूँ रब्बा
चढ़ाया रंग चोखा था।


नसीबी ‘’जान’’ रोये क्यूँ
ख़ुदा का लेखा जोखा था।



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 (c) जान गोरखपुरी

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२५  मार्च २०१५

सोमवार, 23 मार्च 2015

खुशबू लुटा...



खुशबू लुटा गुल चमन में बिखर गया
डाली फलों से भरी झुक सजर गया

दुनिया तमाशाई पत्थर चला थकी
सजदा दिवाना दरे इश्क़ कर गया

है शर्म आती तरक्की पे इस ख़ुदा
जब भूख से अन्नदाता है मर गया

कानून कछुआ तेरी जीत हार क्या??
जो फैसले तक, हो बूढ़ा बशर गया

वो शक्स जादू सा नक्सा परिनुमा
देख्ते ही दिल में अजब सा उतर गया

मै मस्त उसके तसव्वुर में इस कदर
वो बारहा दर आ मेरे गुजर गया

जो इश्क़ हमने किया बेहिसाब था
उसको किया कैद अब बाबहर गया

लो सीख अब जान तुम भी हुनर-ए-चुप
मोहब्बतों से अगर दिल है भर गया


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      (c) जान गोरखपुरी

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रविवार, 22 मार्च 2015

और क्या चाहिए...





इक दीवाने को..
चाहिए बस दीदार...
और क्या चाहिए!

सारी उम्र
करता रहूँ इन्तजार..
और क्या चाहिए!


वादे-पे-वादा कर और भूल जा
खाता रहूँ फरेब बार बार
और क्या चाहिए!


तुझसे नजर मिले
हो तू शर्मसार...
और क्या चाहिए!


तू अपनी जिद न छोड़,न मै अपनी
होती रहे तकरार..
और क्या चाहिए!


छुप जा हुस्न की झलक दिखाके
दिल मेरा रहे बेकरार...
और क्या चाहिए!


जख्म दर जख्म देता रह
जख्म मेरा रहे सदाबहार
और क्या चाहिए!


तेरा अक्स रहता है हरपल मेरे साथ
तुझसा कहाँ कोई गमख्वार
और क्या चाहिए!



मिलता है सदा,पुरअन्दाज-ओ-इत़ाब से   (पुरअंदाज-ओ-इत़ाब से= नये अंदाज और गुस्से से)
दिल का है वो बड़ा दिलदार...
और क्या चाहिए!




ता-उम्र तड़पायेगा,जां लेकर जायेगा
इश्क़ का जहर बड़ा असरदार!
और क्या चाहिए!




तेरे आँखों का मयकदा सलामत रहे
चलता रहें हुस्न का कारोबार
और क्या चाहिए!






                              ‘’पुरानी डायरी के झरोखे से’’
                                १७ सितम्बर २००२

                                -जान गोरखपुरी

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

लुट रही है फसल-ए-बहार..

लुट रही है फसल-ए-बहार दंगो में..
आराम फरमा रहे हैं वो जंगों में...

दिया किसने ये हक़ इन्हें ए-ख़ुदा
ख़ुदी है सो रही खिश्त-ओ-संगों में..

किसने बनाये हैं ये सनमकदे...
ख़ुदा भी बंट गया बन्दों में...

मेरी इन्ही आँखोंने,नजर में तेरी
देखा है खुद को कई रंगों में..

है किसे तौफ़ीक जो गैरों के चाक सिले
मै भी नंगा हो गया नंगों में....


                    

                   ०८ सितम्बर २०१४
             २०१४ में उ.प्र. में फैले दंगों के ऊपर

                    -जान गोरखपुरी

ए-हुस्न-जाना..



ए-हुस्न-जाना..
दिल नही रहा अब तेरा दीवाना...
अब मुझको आया कुछ आराम है।
कि तेरे सिवा जहाँ में
और भी बहुत काम है।



ए-हुस्न-जाना..
दिल अब तुझसे बेजार है..
हुस्नो-इश्क जबसे बना व्यापर है।
हूँ जिसका मै सिपहसलार
बेकार वो दिल का रोजगार है।




ए-हुस्न-जाना..
दूंढ़ ले अब कोई नया ठिकाना...
मालूम मुझको तेरा मकाम है।
के तेरे सिवा जहाँ में
और भी बहुत काम है।



ए-हुस्न-जाना..
छोड़ कफ़स-ए-शम्मा-परवाना...
दुनिया-ए-रू में आ देख क्या आराम है।
मै नहीं! तू नहीं! दर नहीं! हरम नहीं!
कोई है,सब उसी के नाम हैं।




  ***************                         

   (c) जान गोरखपुरी
  ***************

बुधवार, 18 मार्च 2015

लोग मिलते हैं...





लोग मिलते हैं अक्सर यहाँ मुहब्बत से
दिल हैं मिलते यारब बड़े ही मुद्दत से।

आज कल शामें हैं उदास बेवा सी
याद आये है कोई खूब सिद्दत से।

कोई होता है किस कदर अदाकारां
हम रहे इक टक देखते सौ हैरत से।

उसने मुझको यूँ शर्मसां किया बेहद
पेश आया मुझसे बड़े ही इज्जत से।

लबसे तेरे हय शोख़ गालियाँ जाना
बस रहे हम ता-उम्र सुनते लज्ज़त से।

बारहाँ पटके है उसी के दर पे सर
बाज आये ना हम खुदाया उल्फ़त से।






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      (c) ‘जान’ गोरखपुरी
     *****************

नीदों की परियाँ..

तेरे चेहरे को रख लिया है
इस तरह दिल की किताब में..
के मै खोलूं कोई पन्ना
तेरा चेहरा नजर आये !



धडकनों में बस गया है
तेरा ही नाम....
तेरे नाम से ही गुजरती है
हर एक शाम....
तेरे नाम से ही सहर आये!!



इश्क की आग में हम
तो फ़ना हुए जा रहें है..
अहिस्ता-आहिस्ता
जिस्म को सुलगा रहे है..
दुआ करो दोस्तों..
''नीदों की परियाँ''
पलकों पर जल्द उतर आयें !!







                   -जान गोरखपुरी

सोमवार, 16 मार्च 2015

तुमने किया छल..!





तुमने किया छल
भावविभोर विह्वल
जल-थल मन
मन जल-थल !



हर प्रतिमा में ढूंढूँ
बिम्ब तुम्हारे..
अनंतपथ में ढूंढूँ
पदचिन्ह तुम्हारे..
अहा! रहते
तुम सम्मुख सदा..
करते अभिनय नयनों में...
नयनों से ओझल!
तुमने किया छल....





सांझ-सकारे जोहूँ
मै बाट तुम्हारा..
पर सामर्थ्य कहाँ
हृदय में,प्राण में?
भर सकूँ ओज तुम्हारा..
नित्य नए पात्र का
करता मै अभिनय..

फिर भरके तुम
प्राण में अपना उद्दीपन
करते फिर तुम नयन सजल!
तुमने किया छल....



तुमने किया छल
भावविभोर विह्वल
जल-थल मन
मन जल-थल !





                     -कृष्णा मिश्रा
                  

गुरुवार, 12 मार्च 2015

'मेहमान'


ना हाथों में कंगन,
न पैरों में पायल,
ना कानो में बाली,
न माथे पे बिंदियाँ
कुदरत ने सजाया है उसे!!


न बनावट,ना सजावट
न दिखावट,ना मिलावट
गाँव की मिट्टी ने सवारा है उसे!!



ये बांकपन ,ये लड़कपन
चंचल अदाओं में भोलापन,
जवानी के चेहरे में....हँसता हुआ बचपन!!
वख्त ने जैसे....संजोया है उसे!!


उसकी बातें सुनती हैं तितलियाँ
उसीके गीत गाती हैं खामोशियाँ
हँसी पे जिसकी फ़सल लेती है अंगड़ाईयाँ
उसके बगैर,बहारों में है वीरानियाँ..!!
फ़िजाओं..हवाओं...घटाओं...
हर किसी से है दोस्ती उसकी
हर एक ने समझा है उसे!!


कितना खुबसूरत,कितना दिलकश
कितना प्यारा है वो अनजान!
जो है मेरी दुनिया में..
आया चन्द दिनों का मेहमान!!
क्या जाने वो......
किसी ने कितना सोचा है उसे!!



                                    -जान गोरखपुरी

                                       जून २००५

बुधवार, 11 मार्च 2015

'अजीब है ये जिन्दगी'



अजीब है ये जिन्दगी
सलीब है ये जिन्दगी

न जान तू किस खता की
नसीब है ये जिन्दगी

इश्क जिसे है, उसी की
रकीब है ये जिन्दगी

गिनी जु सांसे, बहुत ही
गरीब है ये जिन्दगी

निकाह मौत तुझसे औ

हबीब है ये जिन्दगी


                     - ''जान'' गोरखपुरी
                       

मंगलवार, 10 मार्च 2015

जला न दे...


बस कर ये सितम के,अब सजा न दे
हय! लम्बी उम्र की तू दुआ न दे।


अपनी सनम थोड़ी सी वफ़ा न दे
मुझको बेवफ़ाई की अदा न दे।


गुजरा वख्त लौटा है क्या कभी?
सुबहो शाम उसको तू सदा न दे।


कलमा नाम का तेरे पढ़ा करूँ
गरतू मोहब्बतों में दगा न दे।


इनसानियत को जो ना समझ सके
मुझको धर्म वो मेरे खुदा न दे।


रखके रूह लिफ़ाफे में इश्क़ डुबो              
ख़त मै वो जिसे साकी पता न दे।


न किसी काम का है हुनर-ए-सुखन         ( हुनर-ए-सुखन  =  गज़ल/गीत का हुनर)
जब दो जून की रोटी, कबा न दे।             (कबा = कपड़े)


लिखता हूँ जिगर में आग को लिए
तुझको शेर मेरा उफ़! जला न दे।


रहने दें सता मत जिन्दगी उसे
परदा ‘’जान’’ तेरा गो हटा न दे।




                                             -''जान'' गोरखपुरी
                                              १० मार्च २०१५

बला-ए-इश्क़...

  





कुम्हलाए हम तो जैसे सजर से पात झड़ जायें
यु दिल वीरां कि बिन तेरे, चमन कोई उजड़ जायें


मिरी आव़ाज में है अब चहक उसके आ जाने की
सितारों आ गले लूँ लगा,कि हम तुम अब बिछड़ जायें


कि बरसों बाद मिलके आज छोड़ो शर्म एहतियात
लबों से कह य दो के अब, लबों से आके लड़ जायें


न मारे मौत ना जींस्त उबारे या ख़ुदा खैराँ
बला-ए-इश्क़ पीछे जिस किसी के हाय पड़ जायें


बना डाला ग़मों के साहिलों ने ‘’जान’’ को दरिया
रस्ता पर्वत दिए जाये अगर हम राह अड़ जायें


          




                                  -‘’जान गोरखपुरी’’

                                   07 march 2015

रविवार, 8 मार्च 2015

''अर्धनारीश्वर''



''नारी होना अपने
आप में उपलब्धि है!
स्वयं भगवान शिव
अर्धनारीश्वर है!!
उनका यह रूप प्रमाण है के
नारी अंश नही है केवल उनका !!
बल्कि वे खुद ही नारी रूप में
सृजन करते है
समस्त सृष्टि का''!!








                                        -''कृष्णा मिश्रा''
                                           ०८ मार्च १५
                                       

शनिवार, 7 मार्च 2015

''होली छाप-तिलक''





''लाग लगी फागुन की
रंग कान्हा के हाथ !
जिसकी चुनरी रंग दी
धन धन उसके भाग'' !!



आ सजना फागुन में
चुनर ढाप मै रख लूँ !
न मै रंगू गैर को..
ना तोहे रंगन दूँ..!!





छाप तिलक सब छीनी,मोहे रंगवा लगाईके!
रंगवा लगाइके,मोहे अंगवा लगाइके!!
छाप तिलक सब छीनी,मोहे रंगवा लगाईके!!




प्रेमवटी की गुझिया खिलाईके!
मतवारी कर दीन्ही,मोहे भंगवा मिलाईके!!



गोरी गोरी बइयां,धानी री चुनरियाँ!
बसन्ती कर दीन्ही,मोहे संगवा भिगाईके!!




बल-बल जाऊं मै,तोरे रंगरेजवा!
अपनी सी रंग दीन्ही,मोहे अंगवा लगाईके!!




राधे-श्याम को बल बल जाऊं!
मोहे सुहागन कीन्ही,प्रेम रंगमा डूबाईके!!



                                          -कृष्णा मिश्रा
                                       होली 06 मार्च २०१५
                                   

मंगलवार, 3 मार्च 2015

मै तो तेरा हुआ......




तुमको पा के...
ऐसा लगा के....
सब कुछ पा लिया है...!
मेरे ख़ुदा..
मै तो तेरा हुआ..!
जबसे वो................मेरा हुआ है!!



तेरी गलियाँ..!.....................भा गई मुझको..!!
नजरें जबसे..!......................पा गई तुझको..!!
वल्लाह..!!!
मेरे ख़ुदा..
मै तो तेरा हुआ..!
महबूब को मेरे..............तूने क्या जलवा दिया है.....!!




स....प...ध....म....गा...





शायरी अब तो..!.................आ गई मुझको..!!
लगन वो कोई..!..................लगा गई मुझको..!!
वल्लाह..!!!
मेरे ख़ुदा..
मै तो तेरा हुआ..!
जबसे कानों में..............उसने कुछ कहा है..!!








क्या-क्या अब मै..!................सुनाऊ तुमको..!!
बातें उसकी कैसे..!................बताऊ तुमको..!!

प..मा..म..म...गा..रे....सा.....

वल्लाह..!!!
मेरे ख़ुदा..
मै तो तेरा हुआ..!
जहाँ भी देखूं....................वही दिखता है..!!







आजा इश्क की..!....................भंग पिलाऊ तुझको..!!
रंग में अपने..!.......................भिगाऊ तुझको.!!
वल्लाह..!!!
मेरे ख़ुदा..
मै तो तेरा हुआ..!
तू-ही-तू है महकता................जबसे उसने छुआ है..!!





                  
                                        -‘’कृष्णा मिश्रा’’

                                        ०३ मार्च २०१५

मेनका का आह्वाहन...!!




ये जो आसमां..
रो रहा है इन दिनों
इससे तुम क्यू नही कह देती 
के चुप हो जाये!!
तुम तो मना सकती हो..
हवाए को भी और घटाए को भी!!
मेरे देश का किसान सोया नही है..
पिछले ३-४ दिनों से... 
बार बार टार्च जला 
के यही देखता है..
के इस बार भी साल भर रोना ही पड़ेगा क्या??
अगर तुम मेनका हो 
तो इंद्र को होश में लाओ!!
उसे सुला दो 
अपनी यौवन की मदिरा पिला कर
और दिखा दो के 
विश्वामित्र की तपस्या तोड़ने 
वाली....... तोड़ सकती है इंद्र की मूर्च्छा भी!!



                                             -''कृष्णा मिश्रा''
                                            ३ मार्च २०१५

रविवार, 1 मार्च 2015

‘’मच्छर फ्लू’’

''व्यंग्य''



देश में स्वाइन फ्लू
के कहर के बीच
दुःख-भरी खबर ये है के
बालीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्री
सोनम कपूर 
को स्वाइन फ्लू
होने की खबर की पुष्टी कुछ
समाचार एजेसियों ने की है..
भगवान कोमलांगी को जल्द स्वास्थलाभ दे!
इसी बीच आम आदमी को आशा
की किरण यह जगी है कि
शायद सरकार इस
नाजुक कन्या और उनकी फैन मंडली
के दुःख को संज्ञान में लेते हुए
प्रभावी कदम उठाने में तेजी लाये....!
 

खैर आजकल मै एक अन्य
बीमारी से परेशान हूँ...
और मुझे पूरा यकीं है
की आप भी..
इस महाभयंकर और
महादुखदायी


‘’मच्छर फ्लू’’ नामक बीमारी
से अत्यधिक परेशान होंगे..
महाभयंकर मैंने इसलिये कहा क्युकी
आप स्वाइन फ्लू से तो बच
सकते हैं पर ‘’मच्छर फ्लू’’
से बचना नामुमकिन है...
और मच्छरफ्लू कहने से मेरा तात्पर्य
इसके और इससे होने वाले रोगों के 
सर्वत्र तेजी से फैलने  
के आशय से है...
ऐसा प्रकोप  है इसका कि
आप घर-आफ़िस
स्कूल-कालेज
रेलवे-स्टेशन बस-स्टेशन
अन्डर-ग्राउण्ड प्ले-ग्राउंड
 
कहीं भी चले जाये इससे मुक्ति नही है..
हद तो यह हो गयी है
की पहले आदमी तन को
कपड़ो से ढक के इनसे बच भी
जाता था..पर
हाय रे! क्रमिक विकास के इन योद्धाओं को 
बारम्बार प्रणाम! अल्प समय में ही क्या ख़ूब
प्रगति की है कि आप दो तीन स्तर के
के कपड़े ही क्यों न पहन लें..
उसके ऊपर से भी दंश गड़ाने में भी इनका कोई सानी नही!
तिस पर 'कोढ़ में खाज' वाली समस्या ये के
खुले स्थानों पर व्यक्ति खजुआ के परमसुख पा भी जाता था..
पर अब तो अपने ही व्यूह में फसने वाली स्थिति
हो गयी है...
अब सार्वजानिक स्थानों पे खुजली करने के स्थानों
की भी कोई सीमा होती है के नही ??
और तो और दंश के बाद की झुझलाहट की
जो स्थिति होती है के सामने वाले को
अकारण चमाट! कोई मार दे तो
इसमें कोई अजरज नही होना चाहिए...
दैनिक जीवन के ज़रूरी
कार्यो को करना अब तो किसी
जंग से कम नही रह गया है...
आपने तन से कपड़ा क्या उतारा
जैसे बौराई मधुमक्खियाँ
पीछे पड़ जाये ऐसा दृश्य हो जाता है..
नित्यकर्म करना दुश्वार कर रक्खा है..
मेरे पास शब्द नही है के मै कैसे इस
दुःख की अवस्था का वर्णन करूँ...

मच्चर भागाने और मारने के लिए
विभिन्न प्रकार की
सामग्री बाजार में उपलब्ध है..
ऐसे उत्पाद बनाने वाले की
सीजनल चाँदी होने का समय है..
लेकिन लोशन,लिक्विड,काइल,स्प्रे,आदि
में से कोई भी उपाय अब कारगर सिद्ध नही हो रहा..
इस आत्मघाती जीवट जीव ने
अपने को ऐसा बज्र मैकश बना लिया है के
हर एक डोज कम ही पड़ती जा रही है..
आप संख्या में रक्तबीज की भांति
मरने को हरपल तैयार और
रक्त का नमूना लेने को आतुर इस जीव का 
 कितना भी संहार क्यों न कर डाले
मुक्ति नही मिलने वाली...!
ये सच्चे जेहादी आज के दौर में
आतंकवाद की नई परिभाषा गढ़ रहें है!!



**इस सम्बन्ध में मेरा सरकार को मांग पत्र -------
१-      सभी कार्यालयों आफ़िस दफ्तरों में (सार्वजानिक व प्राइवेट समेत) मच्छरदानीयुक्त बैठकी का प्रबंध होना सुनिश्चित किया जाये!! अथवा आफिस मच्छरप्रूफ बनाना सुनिश्चित करे!
२-      मच्छरप्रूफ ट्रेनों व् बसों को पर्याप्त मात्रा में चलवाया जाये!
३-      मुफ्त मच्छरदानियों को बटवाया जाये!
४-      स्कूल कालेजों को मच्छरप्रूफ बनाने का प्रबंध करें!
५-      मच्छरप्रूफ विशेष प्रकार के कपड़ों का निर्माण की हर राज्य में इकाई का गठन किया जाये और मुफ़्त कपड़े बटवाया जाये!



अन्यथा आम जनता आने वाले समय में उग्र आन्दोलन करने पर विवश हो सकती है!!
यह मेरी स्पष्ट चेतावनी है!!



                                       - ''कृष्णा मिश्रा''

हे माँ शारदे!







मै भूखा हूँ
ज्ञान का ..
मुझे शब्दों का
आहार दो..
हे माँ शारदे!
अपने चरणों में
मुझे दुलार दो..




विचलित मन मेरा
यथा-व्यथा के
टंकारों से..
पतित न हो जाये
क्षणभंगुर अहंकारो से..
अपनी वीणा को
करो झंकृत माँ..
मन के अंधेरों से
मुझे उबार लो..

हे माँ शारदे!
अपने चरणों में
मुझे दुलार दो..





न तम में
मै भटकूँ..
न किसी की
निगाह में खटकूँ..
रक्खूँ सदा समदृष्टि
चाहे बरसे फ़ुहार
या हो मेघवृष्टि..
मुझे हृदय की
न्यूनता से तार दो..

हे माँ शारदे!
अपने चरणों में
मुझे दुलार दो..




जब भी लिखूँ
सच ही लिखूँ
मूक हो जाऊं
गर व्यर्थ मै बकूँ..
मेरी आवाज़ में सुधा
लेखनी में
गंगा का सार दो..
हे माँ शारदे!
अपने चरणों में
मुझे दुलार दो..





                                        -कृष्णा मिश्रा
                                        २७ फ़रवरी १५

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