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शुक्रवार, 26 जून 2015

तिश्नलब हो के..


तिश्नलब हो के  समंदर नही देखे जाते                       (तिश्नालब=  प्यासा)
फ़ासले पास में रहकर नहीं देखे जाते

इश्क मुझको  हो न जाये,न उठा यूँ पर्दा
ख़्वाब आँखों में उतरकर नहीं देखे जाते

जबसे हमने है किया उनसे सवालाते वस्ल
खिड़कियाँ बंद हैं पैकर नहीं देखे जाते                           (पैकर= चेहरा/मुख)


बेवफा लाख ही ठहरा वो प अबभी मुझसे
उसकी राहों के ये पत्थर नहीं देखे जाते

सामना मौत से पल-पल हो अगरचे मंजूर
गैर की बांह में दिलबर नहीं देखे जाते

हर कदम जिसके लिए हमने दुआए माँगी
उसके हाथों में ही खंजर नही देखे जाते


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                 (C) "जान" गोरखपुरी
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सोमवार, 22 जून 2015

मरासिम...



ये हैं मरासिम* उसकी मेरी ही निगाह के                              (मरासिम = रस्में)
तामीरे-कायनात* है जिसका ग़वाह के                     (तामीरे-कायनात = सृष्टि का निर्माण)
..

सजदा करूँ मैं दर पे तेरी गाह गाह के
पाया खुदा को मैंने तो तुमको ही चाह के
 ..

हाँ इस फ़कीरी में भी है रुतबा-ए-शाह के
यारब मै तो हूँ साए में तेरी निगाह के
 ..

जो वो फ़रिश्ता गुजरे तो पा* खुद-ब-खुद लें चूम                           (पा = पाँव)
बिखरे पडे हैं फूल से हम उसकी राह के
 ..

छूटा चुराके दिलको वबाले-जहाँ* से मैं                                    
ऐ “जान” हम हुए हैं मुरीद इस गुनाह के              


 (वबाले-जहाँ = दुनिया भर के बवाल से) सही शब्द वबाल है जो अब आम बोल चाल में बवाल बोला जाने लगा है!

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                     (c) "जान" गोरखपुरी
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गुरुवार, 18 जून 2015

खुशबू ओढ़ कर निकलता है




खुशबू ओढ़ कर निकलता है
फूल जैसे कोई चलता है
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रास्ते महकते हैं सारे
जिस भी सिम्त वो टहलता  है
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हुस्न आफ़रीं कि क्या कहने
जो भी देखे हाथ मलता  है
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गो धनुक है पैरहन उसका       (धनुक=इन्द्रधनुष)
सात रंग में वो ढलता है
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रंगा मुझको जाफ़रानी यूँ         (जाफ़रानी=केसरिया)
रात-दिन चराग़ जलता है
..

इश्क मुझको भी है तुमको भी
वख्त मायने बदलता है
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दोस्त अब कहाँ वो पहले से?
मिलके दिल कहाँ उछलता है?
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अब के हम भी चल बदल जायें
सिक्का कब पुराना चलता है ?
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है फिजा में जह्र वो घोला
दुपहर आदमी उबलता है
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आ लगायें पेंड उजाले के
वो सदाकतें ही फलता है                 (सदाकतें=अच्छाईयाँ)
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जब तलक न बोस हों दो शय
रौशनी का पर न जलता है


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                 (c)‘जान’ गोरखपुरी
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शनिवार, 6 जून 2015

कागज के ख़त..




मुद्दत से जिसने दुनिया वालों से मेरा नाम छुपा रक्खा है
जलने वालों ने ज़माने में उसका ही नाम बेवफा रक्खा है

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रातों-रातों उठ उठ कर हमने आँसू बोयें हैं दिल की जमीं पर
तुम क्या जानोंगे कैसे हमने बाग़-ए-इश्क ये हरा रक्खा है

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वो मेहरबां है तो कुछ और न सुनाई दे,गर हो जाय खफा तो  
चूड़ी ,कंगन, पायल, बादल..कासिद कायनात को बना रक्खा है

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बात कलम और कासिद की क्या जाने ये ईमेल जमाने वाले
आँसू, बोसे, खुशबू, जादू कागज के ख़त में क्या क्या रक्खा है

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इक ना इक दिन तो मिलके ही रहूँगा ‘‘जान’’ उस जादूगर से मैं
जिसने टांकें हैं फलक पे सितारे,जिसने चाँद का दिया रक्खा है


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                       (c) जान गोरखपुरी
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