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गुरुवार, 18 जून 2015

खुशबू ओढ़ कर निकलता है




खुशबू ओढ़ कर निकलता है
फूल जैसे कोई चलता है
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रास्ते महकते हैं सारे
जिस भी सिम्त वो टहलता  है
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हुस्न आफ़रीं कि क्या कहने
जो भी देखे हाथ मलता  है
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गो धनुक है पैरहन उसका       (धनुक=इन्द्रधनुष)
सात रंग में वो ढलता है
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रंगा मुझको जाफ़रानी यूँ         (जाफ़रानी=केसरिया)
रात-दिन चराग़ जलता है
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इश्क मुझको भी है तुमको भी
वख्त मायने बदलता है
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दोस्त अब कहाँ वो पहले से?
मिलके दिल कहाँ उछलता है?
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अब के हम भी चल बदल जायें
सिक्का कब पुराना चलता है ?
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है फिजा में जह्र वो घोला
दुपहर आदमी उबलता है
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आ लगायें पेंड उजाले के
वो सदाकतें ही फलता है                 (सदाकतें=अच्छाईयाँ)
 ..

जब तलक न बोस हों दो शय
रौशनी का पर न जलता है


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                 (c)‘जान’ गोरखपुरी
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