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सोमवार, 22 जून 2015

मरासिम...



ये हैं मरासिम* उसकी मेरी ही निगाह के                              (मरासिम = रस्में)
तामीरे-कायनात* है जिसका ग़वाह के                     (तामीरे-कायनात = सृष्टि का निर्माण)
..

सजदा करूँ मैं दर पे तेरी गाह गाह के
पाया खुदा को मैंने तो तुमको ही चाह के
 ..

हाँ इस फ़कीरी में भी है रुतबा-ए-शाह के
यारब मै तो हूँ साए में तेरी निगाह के
 ..

जो वो फ़रिश्ता गुजरे तो पा* खुद-ब-खुद लें चूम                           (पा = पाँव)
बिखरे पडे हैं फूल से हम उसकी राह के
 ..

छूटा चुराके दिलको वबाले-जहाँ* से मैं                                    
ऐ “जान” हम हुए हैं मुरीद इस गुनाह के              


 (वबाले-जहाँ = दुनिया भर के बवाल से) सही शब्द वबाल है जो अब आम बोल चाल में बवाल बोला जाने लगा है!

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                     (c) "जान" गोरखपुरी
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