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बुधवार, 25 मार्च 2015

गुनाह अपने भी कई मकबूल हैं...

खुशियों में होते है सब हमसफ़र..
गम में साथ कोई खड़ा नही होता!
दूसरों को करके छोटा ए-दोस्त...
कोई बड़ा नही होता!


जाने कितनी खायी ठोकरे
लाख रंजिश की गम ने..!
सामने खींचकर बड़ी लकीर
बड़ा बनना सीखा नही हमने..!!
यही करना था तो तलवार उठाई होती!
हाथ में कलम की न रोशनाई होती..
जंग अदब की मै लड़ा नही होता!!
दूसरों को करके छोटा ए-दोस्त...
कोई बड़ा नही होता!




जिसने रची है सारी ही सृष्टि
उसने है दी सबको एक आसमाँ एक ही जमीं..
जब खुदा ने खुद फर्क न किया बन्दों में!
तो बाँध मत वाइज उसे मतलब के धन्धों में!!
लाख बड़ा बन जाये कोई मगर
उससे कोई बड़ा नही होता!!



आये है सब वहीँ से,जाना है सबको वहीँ
बात है सच,मानो या मानो नही!
मै,मै हूँ करता तुम,तुम हो करते!
एक वो है कि....
शताब्दियों शताब्दियों
युगों युगों से,सुनता है सबकी
मगर कभी कुछ बोलता नहीं होता !



हम कोई रसूल हैं?
गुनाह अपने भी कई मकबूल हैं
कुबूल है!कुबूल है!कुबूल है!
वर्ना बनके गर्द-ए-गुबारां दर-ए-यारां पड़ा न होता!
दुनिया में जान अपना घड़ा न होता!!

दूसरों को करके छोटा ए-दोस्त...
कोई बड़ा नही होता!



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 (c) कृष्णा मिश्रा जान गोरखपुरी

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      १४ सितम्बर २००६

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