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मंगलवार, 27 जनवरी 2015

'तेरी आँखें'


                                                         अब जिएंगे हम किसके सहारे
                                                   तेरी आँखों में अब वो इताब कहाँ 
उठ जाये तो क़यामत ,झुक जाये तो क़यामत 
तेरी पलकों  का जवाब कहाँ । 

अजल से अबद तक है कायम 
और कहीं ऐसा शबाब कहाँ 
हर रोज जुड़ती है ,नए क़त्ल की दास्तां 
तेरी आँखों सी अजब किताब कहाँ । 

तेरे सितम-ओ-करम को रखते है,
सर-आँखों पे मुस्कुराकर 
माना तुमसा कोई नहीं, 
पर हमसा भी दिल का नवाब कहाँ । 

वाह रे!उनके रंग में
खुद को रँगने की जुस्तजू
और कुछ नहीं ना सही,
मुझसे किसी के ख़्वाब कहाँ।

                                   -'जान'
''पुरानी डॉयरी के झरोखे से'  मई०५ 

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