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बुधवार, 21 जनवरी 2015

''ऑटोग्राफ''

ऑटोग्राफ 




आज सुबह जैसे ही मैंने, 
दरवाजा खोला : ऑटोग्राफ के लिए
 एक बच्चा हाथ उठाये खड़ा था -
 मन ही मन गदगद होकर,
 मैंने तुरंत जेब से पेन निकाली और 
अपना फर्राटेदार हस्ताक्षर दे मारा !

तभी उसने झट से अपना मैला सा 
 हाथ खींचा और बोला : मुदे  ऎ नही ताहिये । 
मैंने कहा : फिर क्या चाहिए ?
वह बोला ; पैछै (पैसे ) !!
 यह सुनते ही मै धरातल पर आ गया !!
और कुछ देर तक उसका चेहरा ही देखता रहा 
फिर भारी मन से मैं बोला; 
बेटा! 'पैसे तो नही हैं,पर तुम यह पेन रख लो !ये बहुत कीमती है ।
मेरे हाथ से पेन लेकर,उसने उस ३ रूपये की कलम को  
चारों तरफ से घुमा-घुमाकर देखा,
 फिर कुछ देर तक मुझे घूरता रहा,इस बीच मै
अपने गंतव्य की ओर जाने को बढ़ा ही था कि. पीछे से आवाज़ आई;
लुकिए !!
जैसे ही मै पीछे मुड़ा : उसने  १० की नोट मेरी और बढ़ा दिया । 
यह मेरे स्वाभिमान को सीधे तौर पे चुनौती थी,
इतने में वह मुस्कुराता हुआ,मेरी दी हुई पेन को मेरी ओर बढ़ाते हुये, 
फ़िल्मी अंदाज मे  बोला; आतोग्लाफ पिलीद!! । 
                                                                                                         
  

                                                                             ---कृष्णा मिश्रा 



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