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बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

व्यंग्य- ''कवि होना''

















ये चार आने की जिंदगी भी कोई जिंदगी है?
कवि होना पाप नही
महापाप है..
और इससे बड़ा
जघन्य अपराध
हो ही नही सकता
अगर आप दो बच्चो के बाप है।
कोई आपसे पूछे की आप क्या करते है?
और आप ये कह दे कि ‘’कवि हूँ’’
तो फिर
सामने वाले का रिएक्शन
देखने लायक होता है,
देखनेवाला ऐसे देखता है मानों कि कवि, 'कवि
नही किसी जेल का जल्लाद हो'।
अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है
एक इंटरव्यु में एक साहेब ने मुझसे पूछा
आपकी होबी क्या क्या है?
मैंने कहा,’’जी मुझे लिखने का शौक है’’
अच्छा,’’तो आपको भी लिखने का शौक है’’
क्या लिखते है आप?
‘’जी कविता गीत गजल’’
अच्छा,तो कुछ सुनाइए’’
मैंने अपनी एक कविता सुनाना शुरू की
साहेब ने पास ही पड़े
विजिटिंग कार्ड की सींक बनायीं
और डाल दिया उसे अपने कान में
जी भर के खुजाया-कुकवाया,
कविता की अभी ८-१० पंक्तिया सी सुनाई थी के,
जम्हाई लेते हुए बोले,

‘’मुझे भी कभी लिखने का शौक हुआ करता था’’
अगर लिखा होता तो आज कम से कम
१०-२० कापियां तो भर ही चुकी हुयी होती
जवानी में अकसर ऐसी आदते लग ही जाया करती है,
पर फायदा क्या ?
कुछ भी हाथ नही आता।
अब आपसे उस इंटरव्यू के
रिजल्ट के बारे में बताने की जरूरत
तो है नहीं।
विडम्बना तो यही है कि कवि को कोई
सीरियसली नही लेता,
समाज सरकार दुनिया
की तो छोडिये
घर के लोगों के लिये भी
कवि का महत्व,
एक ऐसे बाँझ की तरह ही होता है,
जो सभी कार्य तो कर सकता है,
पर घर को आगे चलाने के लिए
जो चीज (पैसा) चाहिए
वही पैदा नही कर सकता।
मूलभूत आवश्यकताओं से ही बेचारा
पार नही पाता।
एक दिन रास्ते में मेरे एक अभिन्न मित्र
मिल गए,
हाल-चाल कुशलक्षेम के बाद,बात कुछ आगे बढ़ी
तो कहने लगे,
‘’यार तुमने अपनी वेशभूषा देखी है’’?
मैंने कहा,- क्यों क्या हुआ मेरी वेशभूषा को?
तो बोले,
यार तुम्हे ये जीन्सपेंट-बूसट,सूट-बूट इस तरह के 
पहनावे छोड़ खादी के धोती-कुर्ते,
पजामा आदि पहनना चाहिए,
कवि हो तो कवि की तरह दिखना चाहिए।
मैंने कहा, ‘’भाई क्यों मरवाने पे तुले हो-
जिस दिन मैंने धोती-कुर्ते,पजामा को धारण किया
उसी दिन से मेरे घर का राशनपानी बंद हो जायेगा,
दुकानवाले उधार देना बंद कर देंगे,
दूधवाला,अखबारवाला,धोबी ये सभी
घर का रास्ता भूल जायेगें,
बाप-दादा ने जो इज्जत कमाई है,
उसी पर ये घर चल रहा है,
सब बंद हो जायेगा
और तो और तुम्हारी भाभी
उसी छड़ घर छोड़ जाएगी,
बच्चे,बाप को पहचानना बंद कर देंगे।
मेरी बात सुनकर,
वह ऐसे जोरो से हँसा
मनो अट्टाहास कर रहा हो,
जिसे सुनकर अगल बगल
से गुजरने वाले कुछ देर के लिए ठिठक गए,
अगले १ मिनट तक वह हसता रहा
मानो कई सालो से न हसने
का कोटा पूरा कर रहा हो,
बुत की तरह मै उसे देखा किया
और फिर रस्मअदायगी कर
हमने एक-दुसरे से विदा ली।

                    
-कृष्णा मिश्रा

४ फरवरी २०१५

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