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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

'कभी न कभी'










ऐ जिंदगी
कभी न कभी
मिलेंगे हम
मुझको है ये यकीं


तेरी मंजिल और...
मुझको जाना कहीं..
रहबर कहीं..
और ठिकाना कहीं
मगर-ए-हसीं
एक होंगे रास्ते..
एक होंगी मंजिलें
कभी न कभी
मिलेंगे हम
मुझको है ये यकीं।


जाने कितने फासलें
है दरमियाँ
जाने कितनी
हैं दूरियाँ.....
कुछ मेरी हैं हदें
कुछ तेरी हैं मजबूरियाँ.....
................
......................................
जो भी हैं फासले
घटेंगे एक दिन
सब मिटेंगे एक दिन...
एक दिन..एक होंगे सिलसिले
कभी न कभी
मिलेंगे हम......
मुझको है ये यकीं
मुझको है ये यकीं।

                 -‘जान

            पुरानी डायरी के झरोखे से
                 जनवरी ०८
             

                                     
           

                      

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