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शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

''दुल्हन''






बस यूँ है जिंदगी आजकल
खूँ से मेरे बनती है दुल्हन गजल।



बहुत शर्माती है,दबे पाँव घूँघट में आती है
दफ्न हुए दिल के अरमां जाते है मचल।



हाय! ये पशेमां मुलाकात,तेवर पे बरसात!
और आँखों से उतरता हुआ कागज पे काजल।


संगमरमर के सीखचों में,कब फूल खिले है?
खाक में ही खिलता है,मोहब्बत का कव़ल।



मिट गये मिटाने वाले,जी गए इसमें मिटने वाले
मोहब्बत है कायम जान,ता-कयामत अबद-दर-अजल।


बस यूँ है जिंदगी आजकल
खूँ से मेरे बनती है दुल्हन गजल।




                            -जान

                      १३ फ़रवरी २०१५

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