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शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

'विस्मरण'





केन्द्रित करती है जब
आंखे तुम्हारी मुझपे ध्यान..!
कहाँ चला जाता है
तब सारा मेरा ज्ञान..!!



बरबस मै चल पड़ता तुम्हारे पीछे
जैसे मन को मेरे कोई हो खींचे
छेड़े ह्रदय तब जब बांसुरी की तान..!
कहाँ चला जाता है तब सारा मेरा ज्ञान..!!



बेकल प्राण-मन झूमे और गाए
टूट जाती है सब ही सीमाए
मान-अपमान-अभिमान...!
कहाँ चला जाता है तब सारा मेरा ज्ञान..!!



जब चाहे जिस ओर देते मोड़
अंगुली पकड़ चलना सिखा अभी,कि देते छोड़
मर्म मन का जानू तुम्हारे अभी कि,बन जते अनजान..!!
कहाँ चला जाता है तब सारा मेरा ज्ञान..!!



                               -कृष्णा मिश्रा

                               १५ फरवरी ०९

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