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मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

''तिलिस्म''

वही रहगुजर, वही साकी, वही सनम
सदियों से बैठे हैं वहीं हम..
जाने कितने ज़माने गुजर गए इस डगर से
जान तुम कितनी बार गुजर गए इधर से
फिर भी है वही गुमां, वही फरेब, वही भरम
वही रहगुजर वही साकी वही सनम
सदियों से बैठे है वहीं हम..

कितनी बार पकड़ा है मैंने हाथ तुम्हारा
कितनी बार है भिगोया
आसुओं से तुम्हारा दामन..
चुने है कितनी बार तुम्हारी राह के काटें
जबीं से लगाया है कितनी ही बार
तुम्हारी राह का पत्थर...
कितनी ही बार सजदे किये है वहाँ
जहाँ छोड़ गए थे तुम अपने पाँव के निशां..
कितनी ही बार कहा है कि........जाना जरुरी है क्या?
कितनी मिन्नतें की है उससे कि रोक ले तुमको!

चुरायी है कितनी ही खुशियाँ
फलक से तुम्हारे लिए..
कितने ही गुनाह किये हैं
की तुम मुस्कुराओ..
जाने कितने रिश्तों की जडें खोदी है
कि बनी रहे तुमसे निस्बत।
कितने ही आँख के आसू छुपाये है मैंने तुमसे......
बेबात मुस्कुराया किया है छुपा के अपने गम
और पलक के मोतियों को पिरोया है
बनने को तुम्हारे गले का हार..


तुम्हारी जुल्फ ने जो किया था गिरिफ्तां

मै अब भी भीगता हूँ उसी सावन में
मै झूमता हूँ अब भी उसी नशे में
तुम्हारी निगाह ने जो छलका दिए थे कभी..
देखता हूँ मै उन तुम्हारे लबों की जुम्बिश
 तुम्हारे एक एक लफ्ज याद है मुझे
कितनी ही बार जिया है उनको........
कितनी ही बार डूबा हूँ तुम्हारी आँखों में
ढ़ूढ़ने को इनके किनारे......



पढ़ा है कितनी ही बार मैंने
तुम्हारे चेहरे के सफहों को..
मगर न ढ़ूढ़ पाया आज तक
तुम्हारी मुस्कराहट की वजहों को..
के तुम्हारे माथे पे पड़ते थे जो बल
मेरी हर बात के बाद बेबात...
या फिर पहली ही बार में मिलकर
होना तुम्हारा बेबाक यूँ..
जैसे सदियों से इन आँखों का गुलाम रहा हूँ मैं
अब तक न समझ पाया हूँ क्यूँ??
कितनी ही बार मिले हो तुम मुझे इस तरह से
तुम्हारा चेहरा खिला है न जाने कितने ही ऐसे ही चेहरों में
और हर बार बिछड़ गए हम
अधूरे वादों के साथ
हर बार होता आया है यही के..
वही रहगुजर वही साकी वही सनम
सदियों से बैठे हैं वहीँ हम
 



कुछ तो है.............जो है अब भी बचा
कहीं न कहीं रह गयी है
कोई न कोई कमी...

ढ़ूढ़ रहा हूँ फिरसे.....
उसी गर्द में अर्श को
जहाँ रह गए थे तुम्हारे पैरो के निशां
कोई तो राज खुले..
चूम रहा हूँ फिर वही
तुम्हारी राह का पत्थर
कुछ तो प्यास बुझे..
कुरेद रहा हु जख्मो को
कोई तो रास्ता मिले..
सुन रहा हूँ तुम्हारी आवाज़
सदा में कोई तो अजां मिले..
देख रहा हूँ तुम्हारे होंठो की जुम्बिश
साज कोई तो नया छिड़े..
आँखों में तुम्हरी रख दी है आंखें
शायद के अपना पता मिले..
जिस्म में तूम्हारे उतार दिया है जिस्म
और सांसो में तुम्हारी
सजा दी है अपनी धड़कन
कहीं कोई तो वफ़ा मिले
फेंक दिए हैं सभी अहं के ताज!
छोड़ दिए हैं सभी बंधन
तोड़ दिए हैं सारे ही लाज के दर्पण
अर्पण का जो था गुमान
छोड़कर उनको..
उतार दिए हैं ये देह रूपी वस्त्र ..
के जो कुछ भी हुई थी भूल
वो इसके साथ उतर जाये
और फिर ये तिलिस्म टूट जाये

और आजाद हो जाये हम दोनों।

                     - कृष्णा मिश्रा 'जान'
                         जनवरी २०११

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