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बुधवार, 27 मई 2015

सच का ओज..



सच का ओज भरम क्या जाने
रौशनी मेरी तम क्या जाने
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अंधियारे को झुकने वाले
एक दीप का दम क्या जाने
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दुधिया रंग नहाने वाले
लालटेन का गम क्या जाने
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मटई* प्याल की सौंधी बातें         (मटई/मटिया (भोजपुरी)= मिट्टी)
पालथीन के बम क्या जाने
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हमको सिर्फ है साकी से काम
और मय कोई हम क्या जाने
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बात बात मुकरने वाले
क्या होती है कसम क्या जाने
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क्या है ‘जान’ बशर का मजहब
गो ये दैरो-हरम* क्या जाने                 (दैरो हरम = मंदिर-मस्जिद)

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मौलिक व् अप्रकाशित (c) ‘जान’ गोरखपुरी
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