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रविवार, 15 फ़रवरी 2015

'कोई शाम'




कोई शाम बैठो पास मेरे
तुम्हारी जुल्फें संवारा करूँ..
हौले-हौले तुम मुस्कुराया करो...
हौले-हौले तुम्हे दिल में उतारा करूँ !



मेरी तो इक उम्र से रही है तमन्ना यही
दिल तुम्हारा घर हो मेरा...
आँखों में तुम्हारी गुजरा करूँ !
हौले-हौले तुम मुस्कुराया करो...
हौले-हौले तुम्हे दिल में उतारा करूँ !



तुमसे मिलके है छाया ये कैसा जादू...?
बस गयी है मुझमे बस तुम्हारी ही खुशबू..
के फूलों सा महका बहारा करूँ !
हौले-हौले तुम मुस्कुराया करो...
हौले-हौले तुम्हे दिल में उतारा करूँ !



                            -जान
                          दिसंबर २००८
                         पुरानी डायरी के झरोखे से

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