मंगलवार, 31 मार्च 2015

जो न सोचा था कभी...



जो न सोचा था कभी,वो भी किया किये
हम सनम तेरे लिये,मर-मर जिया किये


***


तेरी आँखों से पी के आई जवानियाँ
दम निकलता ही  रहा, पर हम पिया किये


***

आँख हरपल राह तकती ही रही सनम..
फर्श पलकों को किये,दिल को दिया किये


***

आदतन हम कुछ किसी से मांग ना सके
और हिस्से जो लगा वो भी दिया किये


***

जख्म को अपने कभी मर हम न मिल सका
गैर के जख्मों को हम तो बस सिया किये







********************************
          (c) ‘जान’ गोरखपुरी
********************************
    ''पुरानी डायरी के झरोखे से''
              १७ मार्च २००६

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

'गुलाब आँखें'

मेरी दुनिया रहने दो अपनी ख़्वाब आँखें
दो जहाँ हैं मेरी ये दो गुलाब आँखें                           (गुलाब आँखें= महकती आँखें)





अब तू सम्हल जिंदगी होश खो चुके हम
है मिला दी आंखों उसने शराब आँखें





ढूंढ लेंगे हम.....रहो पास तुम बैठे
सब सवालों का देती हैं जव़ाब आँखें





मेरी मोहब्बत इबादत है हर नफ़स में
रखती हो तुम तो मेरा सब हिसाब आँखें





तुम पलक के मस्त पन्ने उलटते जाओ
पढ़ रहा हूँ 'जान' तेरी किताब आँखें





****************************
        (c) ‘जान’ गोरखपुरी
****************************
           
              २७ मार्च २०१५ 

बुधवार, 25 मार्च 2015

गुनाह अपने भी कई मकबूल हैं...

खुशियों में होते है सब हमसफ़र..
गम में साथ कोई खड़ा नही होता!
दूसरों को करके छोटा ए-दोस्त...
कोई बड़ा नही होता!


जाने कितनी खायी ठोकरे
लाख रंजिश की गम ने..!
सामने खींचकर बड़ी लकीर
बड़ा बनना सीखा नही हमने..!!
यही करना था तो तलवार उठाई होती!
हाथ में कलम की न रोशनाई होती..
जंग अदब की मै लड़ा नही होता!!
दूसरों को करके छोटा ए-दोस्त...
कोई बड़ा नही होता!




जिसने रची है सारी ही सृष्टि
उसने है दी सबको एक आसमाँ एक ही जमीं..
जब खुदा ने खुद फर्क न किया बन्दों में!
तो बाँध मत वाइज उसे मतलब के धन्धों में!!
लाख बड़ा बन जाये कोई मगर
उससे कोई बड़ा नही होता!!



आये है सब वहीँ से,जाना है सबको वहीँ
बात है सच,मानो या मानो नही!
मै,मै हूँ करता तुम,तुम हो करते!
एक वो है कि....
शताब्दियों शताब्दियों
युगों युगों से,सुनता है सबकी
मगर कभी कुछ बोलता नहीं होता !



हम कोई रसूल हैं?
गुनाह अपने भी कई मकबूल हैं
कुबूल है!कुबूल है!कुबूल है!
वर्ना बनके गर्द-ए-गुबारां दर-ए-यारां पड़ा न होता!
दुनिया में जान अपना घड़ा न होता!!

दूसरों को करके छोटा ए-दोस्त...
कोई बड़ा नही होता!



**********************************
 (c) कृष्णा मिश्रा जान गोरखपुरी

**********************************
      १४ सितम्बर २००६

मंगलवार, 24 मार्च 2015

जिसे हर शय में...

जिसे हर शय में देखा था
नजर का मेरी धोखा था।


भरम तेरी निगाहों का
कोई जादू अनोखा था।


सदी बीती जहां लम्हों
मेरा जग वो झरोखा था।


बरसतीं खार आखें अब
लबों सागर जो सोखा था।


गया न इश्क खूँ रब्बा
चढ़ाया रंग चोखा था।


नसीबी ‘’जान’’ रोये क्यूँ
ख़ुदा का लेखा जोखा था।



******************
 (c) जान गोरखपुरी

******************
२५  मार्च २०१५

सोमवार, 23 मार्च 2015

खुशबू लुटा...



खुशबू लुटा गुल चमन में बिखर गया
डाली फलों से भरी झुक सजर गया

दुनिया तमाशाई पत्थर चला थकी
सजदा दिवाना दरे इश्क़ कर गया

है शर्म आती तरक्की पे इस ख़ुदा
जब भूख से अन्नदाता है मर गया

कानून कछुआ तेरी जीत हार क्या??
जो फैसले तक, हो बूढ़ा बशर गया

वो शक्स जादू सा नक्सा परिनुमा
देख्ते ही दिल में अजब सा उतर गया

मै मस्त उसके तसव्वुर में इस कदर
वो बारहा दर आ मेरे गुजर गया

जो इश्क़ हमने किया बेहिसाब था
उसको किया कैद अब बाबहर गया

लो सीख अब जान तुम भी हुनर-ए-चुप
मोहब्बतों से अगर दिल है भर गया


********************************
      (c) जान गोरखपुरी

********************************

रविवार, 22 मार्च 2015

और क्या चाहिए...





इक दीवाने को..
चाहिए बस दीदार...
और क्या चाहिए!

सारी उम्र
करता रहूँ इन्तजार..
और क्या चाहिए!


वादे-पे-वादा कर और भूल जा
खाता रहूँ फरेब बार बार
और क्या चाहिए!


तुझसे नजर मिले
हो तू शर्मसार...
और क्या चाहिए!


तू अपनी जिद न छोड़,न मै अपनी
होती रहे तकरार..
और क्या चाहिए!


छुप जा हुस्न की झलक दिखाके
दिल मेरा रहे बेकरार...
और क्या चाहिए!


जख्म दर जख्म देता रह
जख्म मेरा रहे सदाबहार
और क्या चाहिए!


तेरा अक्स रहता है हरपल मेरे साथ
तुझसा कहाँ कोई गमख्वार
और क्या चाहिए!



मिलता है सदा,पुरअन्दाज-ओ-इत़ाब से   (पुरअंदाज-ओ-इत़ाब से= नये अंदाज और गुस्से से)
दिल का है वो बड़ा दिलदार...
और क्या चाहिए!




ता-उम्र तड़पायेगा,जां लेकर जायेगा
इश्क़ का जहर बड़ा असरदार!
और क्या चाहिए!




तेरे आँखों का मयकदा सलामत रहे
चलता रहें हुस्न का कारोबार
और क्या चाहिए!






                              ‘’पुरानी डायरी के झरोखे से’’
                                १७ सितम्बर २००२

                                -जान गोरखपुरी

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

लुट रही है फसल-ए-बहार..

लुट रही है फसल-ए-बहार दंगो में..
आराम फरमा रहे हैं वो जंगों में...

दिया किसने ये हक़ इन्हें ए-ख़ुदा
ख़ुदी है सो रही खिश्त-ओ-संगों में..

किसने बनाये हैं ये सनमकदे...
ख़ुदा भी बंट गया बन्दों में...

मेरी इन्ही आँखोंने,नजर में तेरी
देखा है खुद को कई रंगों में..

है किसे तौफ़ीक जो गैरों के चाक सिले
मै भी नंगा हो गया नंगों में....


                    

                   ०८ सितम्बर २०१४
             २०१४ में उ.प्र. में फैले दंगों के ऊपर

                    -जान गोरखपुरी

योगदान देने वाला व्यक्ति