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शुक्रवार, 7 अगस्त 2015
रविवार, 12 जुलाई 2015
बुधवार, 1 जुलाई 2015
अब जो जायेंगे...
अब जो जायेंगे उस गली तो सबा छेड़ेगी (सबा = प्रभात समीर)
वारे उल्फ़त! मुझको मेरी ही वफ़ा छेड़ेगी
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जिसको आँखों में भरके फिरते थे हम इतराते
हाय जालिम तेरी कसम वो अदा छेड़ेगी
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जो गुजरते हर एक दर पे थी हमने मांगी
राह में मिलके मुझसे वो हर दुआ छेड़ेगी
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वो जो बातें ख्यालों की ही रह गई बस होकर
बेसबब बेवख्त आ मुद्दा बारहा छेड़ेगी (बारहा = बार-बार)
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सुनते ही जिसको तुम चले आते थे दौड़े
हाँ फजाओ में गूंजती वो सदा छेड़ेगी
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चूम के हाथ अपने हवाओं के बोसे देना
अब तो सांसों की आती जाती हवा छेड़ेगी
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था नजर आया जिनमे वो ’जान’ सौ रंगों में
अरगनी से लिपटी पड़ी वो कबा छेड़ेगी (कबा = कपड़े)
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मौलिक व् अप्रकाशित (c)"जान" गोरखपुरी
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गुरुवार, 18 जून 2015
खुशबू ओढ़ कर निकलता है
खुशबू ओढ़ कर निकलता है
फूल जैसे कोई चलता है
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रास्ते महकते हैं सारे
जिस भी सिम्त वो टहलता है
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हुस्न आफ़रीं कि क्या कहने
जो भी देखे हाथ मलता है
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गो धनुक है पैरहन उसका (धनुक=इन्द्रधनुष)
सात रंग में वो ढलता है
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रंगा मुझको जाफ़रानी यूँ (जाफ़रानी=केसरिया)
रात-दिन चराग़ जलता है
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इश्क मुझको भी है तुमको भी
वख्त मायने बदलता है
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दोस्त अब कहाँ वो पहले से?
मिलके दिल कहाँ उछलता है?
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अब के हम भी चल बदल जायें
सिक्का कब पुराना चलता है ?
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है फिजा में जह्र वो घोला
दुपहर आदमी उबलता है
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आ लगायें पेंड उजाले के
वो सदाकतें ही फलता है (सदाकतें=अच्छाईयाँ)
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जब तलक न बोस हों दो शय
रौशनी का पर न जलता है
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(c)‘जान’ गोरखपुरी
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शनिवार, 6 जून 2015
कागज के ख़त..
मुद्दत से जिसने दुनिया वालों से मेरा नाम छुपा रक्खा है
जलने वालों ने ज़माने में उसका ही नाम बेवफा रक्खा है
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रातों-रातों उठ उठ कर हमने आँसू बोयें हैं दिल की जमीं पर
तुम क्या जानोंगे कैसे हमने बाग़-ए-इश्क ये हरा रक्खा है
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वो मेहरबां है तो कुछ और न सुनाई दे,गर हो जाय खफा तो
चूड़ी ,कंगन, पायल, बादल..कासिद कायनात को बना रक्खा है
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बात कलम और कासिद की क्या जाने ये ईमेल जमाने वाले
आँसू, बोसे, खुशबू, जादू कागज के ख़त में क्या क्या रक्खा है
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इक ना इक दिन तो मिलके ही रहूँगा ‘‘जान’’ उस जादूगर से मैं
जिसने टांकें हैं फलक पे सितारे,जिसने चाँद का दिया रक्खा है
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(c) जान गोरखपुरी
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शनिवार, 9 मई 2015
खुद से खफा हूँ...
खुद से खफा हूँ जिन्दगी मक्तल* हुयी जाती है मक्तल*= कत्लगाह
कोई खता गो आजकल पल पल हुयी जाती है
जबसे मुझे उसने छुआ है क्या कहूँ हाले दिल
शहनाई दुनिया धड़कने पायल हुयी जाती है
अब जबकि मै मानिन्द-सहरा सा होता जाता हूँ मानिन्द-सहरा*= मरुस्थल की तरह
है क्या कयामत ये??जुल्फ वो बादल हुयी जाती है
शम्मा जलाकर मेरे दिल का दाग जिसने पारा* पारा*= बनाना/दागना
स्याही वही अब चश्म का काजल हुयी जाती है
सदके ख़ुदा को जाऊ मै क्या खूब रौशन है नूर
नजरें मेरी टुक देखते घायल हुयी जाती है
गजलें मेरी सुन फूल गुलशन में नये खिलते हैं
दादे-शजर जैसे नयीं कोंपल हुयी जाती है
इस मस्त पुरवाई में तुम अब चांदनी बन आओ
तन्हाई की रातें बड़ी बेकल* हुयी जाती है बेकल*= बेचैन
मुझको कभी अपनी अना पे नाज आता था ‘’जान’’
अब कायनात उसकी तहे आँचल हुयी जाती है
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(c) ‘जान’ गोरखपुरी
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रविवार, 19 अप्रैल 2015
ये हसीन काम..
हाँ ये हसीन काम हमने ही किया
खुद को तो तमाम हमने ही किया
आगाजे-बरबादी तेरा थी करम
अंजाम इंसराम हमने ही किया (इंसराम = व्यवस्था)
रोज ये कहना कि न आयेंगे पर
कू पे तेरी शाम हमने ही किया (कू= गली/दर)
हुस्न पे यूँ सनम न हो तू बदगुमां
जहाँ में तेरा नाम हमने ही किया
हर सुबह न मुँह को लगायेंगे कभी
और शाम-इंतजाम हमने ही किया
कौन गुजरता वरना ’जान’ यां से
इन मिसाल को गाम हमने ही किया
किसकी थी मजाल तंज जो करता
खुद को ‘जान’ निलाम हमने ही किया
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(c) जान गोरखपुरी
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१९ अप्रैल २०१५
मंगलवार, 7 अप्रैल 2015
खुदा तेरी ज़मीं का..
खुदा तेरी ज़मीं का जर्रा जर्रा बोलता है
करम तेरा जो हो तो बूटा बूटा बोलता है
किसी दिन मिलके तुझमें, बन मै जाऊँगा मसीहा
अना की जंग लड़ता मस्त कतरा बोलता है
बिछड़ना है सभी को इक न इक दिन, याद रख तू
नशेमन से बिछड़ता जर्द पत्ता बोलता है
हुनर का हो तू गर पक्का तो जीवन ज्यूँ शहद हो
निखर जा तप के मधुमक्खी का छत्ता बोलता है
बहुत दिल साफ़ होना भी नही होता है अच्छा
किसी का मै न हो पाया,ये शीशा बोलता है
गले से भी लगाया बज्म-ए-मय में भी बिठाया
किसी ने सच कहा है दोस्त,कपड़ा बोलता है
सुनो दीमक अहं की चट है जाती आदमी को
युं गर हो शख्स कम, ज्यादा तो ओह्दा बोलता है
हुई बारिश घरौंदे साथ बुनकर तोड़ बैठे
वही दिन थे सुनहरे दिल का बच्चा बोलता है
बड़े खुदगर्ज पत्थर लोग़ रहते हैं जमीं पर
फ़लक से टूटता बेकल सितारा बोलता है
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(c) 'जान' गोरखपुरी
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०७ अप्रैल २०१५
गुरुवार, 2 अप्रैल 2015
मै तो बलिहारी...
मै तो बलिहारी,अमीर हो गया
इश्क़ में रब्बा फकीर हो गया
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मेरे रांझे का मुझे पता नहीबिन देखे ही मै तो हीर हो गया
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उसके जलवे यूँ सुने कमाल के
दिलको किस्सा उसका तीर हो गया
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शिवशिवा घट-घट मुझे पिलाओ अब
तिश्न मै वो गंग नीर हो गया
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उसको पहनूं धो सुखाऊँ रोज मै
लाज मेरी अब वो चीर हो गया
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गाऊँ कलमा मै सुनाऊँ दर-ब-दर
‘’जान’’ज्यूँ मै कोई पीर हो गया
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(c) ‘जान’ गोरखपुरी
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०२ अप्रैल २०१५
मंगलवार, 31 मार्च 2015
जो न सोचा था कभी...
जो न सोचा था कभी,वो भी किया किये
हम सनम तेरे लिये,मर-मर जिया किये
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तेरी आँखों से पी के आई जवानियाँ
दम निकलता ही रहा, पर हम पिया किये
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आँख हरपल राह तकती ही रही सनम..
फर्श पलकों को किये,दिल को दिया किये
***
आदतन हम कुछ किसी से मांग ना सके
और हिस्से जो लगा वो भी दिया किये
***
जख्म को अपने कभी मर हम न मिल सका
गैर के जख्मों को हम तो बस सिया किये
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(c) ‘जान’ गोरखपुरी
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''पुरानी डायरी के झरोखे से''
१७ मार्च २००६
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