शुक्रवार, 20 मार्च 2015

ए-हुस्न-जाना..



ए-हुस्न-जाना..
दिल नही रहा अब तेरा दीवाना...
अब मुझको आया कुछ आराम है।
कि तेरे सिवा जहाँ में
और भी बहुत काम है।



ए-हुस्न-जाना..
दिल अब तुझसे बेजार है..
हुस्नो-इश्क जबसे बना व्यापर है।
हूँ जिसका मै सिपहसलार
बेकार वो दिल का रोजगार है।




ए-हुस्न-जाना..
दूंढ़ ले अब कोई नया ठिकाना...
मालूम मुझको तेरा मकाम है।
के तेरे सिवा जहाँ में
और भी बहुत काम है।



ए-हुस्न-जाना..
छोड़ कफ़स-ए-शम्मा-परवाना...
दुनिया-ए-रू में आ देख क्या आराम है।
मै नहीं! तू नहीं! दर नहीं! हरम नहीं!
कोई है,सब उसी के नाम हैं।




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   (c) जान गोरखपुरी
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बुधवार, 18 मार्च 2015

लोग मिलते हैं...





लोग मिलते हैं अक्सर यहाँ मुहब्बत से
दिल हैं मिलते यारब बड़े ही मुद्दत से।

आज कल शामें हैं उदास बेवा सी
याद आये है कोई खूब सिद्दत से।

कोई होता है किस कदर अदाकारां
हम रहे इक टक देखते सौ हैरत से।

उसने मुझको यूँ शर्मसां किया बेहद
पेश आया मुझसे बड़े ही इज्जत से।

लबसे तेरे हय शोख़ गालियाँ जाना
बस रहे हम ता-उम्र सुनते लज्ज़त से।

बारहाँ पटके है उसी के दर पे सर
बाज आये ना हम खुदाया उल्फ़त से।






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      (c) ‘जान’ गोरखपुरी
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नीदों की परियाँ..

तेरे चेहरे को रख लिया है
इस तरह दिल की किताब में..
के मै खोलूं कोई पन्ना
तेरा चेहरा नजर आये !



धडकनों में बस गया है
तेरा ही नाम....
तेरे नाम से ही गुजरती है
हर एक शाम....
तेरे नाम से ही सहर आये!!



इश्क की आग में हम
तो फ़ना हुए जा रहें है..
अहिस्ता-आहिस्ता
जिस्म को सुलगा रहे है..
दुआ करो दोस्तों..
''नीदों की परियाँ''
पलकों पर जल्द उतर आयें !!







                   -जान गोरखपुरी

सोमवार, 16 मार्च 2015

तुमने किया छल..!





तुमने किया छल
भावविभोर विह्वल
जल-थल मन
मन जल-थल !



हर प्रतिमा में ढूंढूँ
बिम्ब तुम्हारे..
अनंतपथ में ढूंढूँ
पदचिन्ह तुम्हारे..
अहा! रहते
तुम सम्मुख सदा..
करते अभिनय नयनों में...
नयनों से ओझल!
तुमने किया छल....





सांझ-सकारे जोहूँ
मै बाट तुम्हारा..
पर सामर्थ्य कहाँ
हृदय में,प्राण में?
भर सकूँ ओज तुम्हारा..
नित्य नए पात्र का
करता मै अभिनय..

फिर भरके तुम
प्राण में अपना उद्दीपन
करते फिर तुम नयन सजल!
तुमने किया छल....



तुमने किया छल
भावविभोर विह्वल
जल-थल मन
मन जल-थल !





                     -कृष्णा मिश्रा
                  

गुरुवार, 12 मार्च 2015

'मेहमान'


ना हाथों में कंगन,
न पैरों में पायल,
ना कानो में बाली,
न माथे पे बिंदियाँ
कुदरत ने सजाया है उसे!!


न बनावट,ना सजावट
न दिखावट,ना मिलावट
गाँव की मिट्टी ने सवारा है उसे!!



ये बांकपन ,ये लड़कपन
चंचल अदाओं में भोलापन,
जवानी के चेहरे में....हँसता हुआ बचपन!!
वख्त ने जैसे....संजोया है उसे!!


उसकी बातें सुनती हैं तितलियाँ
उसीके गीत गाती हैं खामोशियाँ
हँसी पे जिसकी फ़सल लेती है अंगड़ाईयाँ
उसके बगैर,बहारों में है वीरानियाँ..!!
फ़िजाओं..हवाओं...घटाओं...
हर किसी से है दोस्ती उसकी
हर एक ने समझा है उसे!!


कितना खुबसूरत,कितना दिलकश
कितना प्यारा है वो अनजान!
जो है मेरी दुनिया में..
आया चन्द दिनों का मेहमान!!
क्या जाने वो......
किसी ने कितना सोचा है उसे!!



                                    -जान गोरखपुरी

                                       जून २००५

बुधवार, 11 मार्च 2015

'अजीब है ये जिन्दगी'



अजीब है ये जिन्दगी
सलीब है ये जिन्दगी

न जान तू किस खता की
नसीब है ये जिन्दगी

इश्क जिसे है, उसी की
रकीब है ये जिन्दगी

गिनी जु सांसे, बहुत ही
गरीब है ये जिन्दगी

निकाह मौत तुझसे औ

हबीब है ये जिन्दगी


                     - ''जान'' गोरखपुरी
                       

मंगलवार, 10 मार्च 2015

जला न दे...


बस कर ये सितम के,अब सजा न दे
हय! लम्बी उम्र की तू दुआ न दे।


अपनी सनम थोड़ी सी वफ़ा न दे
मुझको बेवफ़ाई की अदा न दे।


गुजरा वख्त लौटा है क्या कभी?
सुबहो शाम उसको तू सदा न दे।


कलमा नाम का तेरे पढ़ा करूँ
गरतू मोहब्बतों में दगा न दे।


इनसानियत को जो ना समझ सके
मुझको धर्म वो मेरे खुदा न दे।


रखके रूह लिफ़ाफे में इश्क़ डुबो              
ख़त मै वो जिसे साकी पता न दे।


न किसी काम का है हुनर-ए-सुखन         ( हुनर-ए-सुखन  =  गज़ल/गीत का हुनर)
जब दो जून की रोटी, कबा न दे।             (कबा = कपड़े)


लिखता हूँ जिगर में आग को लिए
तुझको शेर मेरा उफ़! जला न दे।


रहने दें सता मत जिन्दगी उसे
परदा ‘’जान’’ तेरा गो हटा न दे।




                                             -''जान'' गोरखपुरी
                                              १० मार्च २०१५

योगदान देने वाला व्यक्ति